उद्रू शायरी 4

मरकब से इस्तीफ़ादा किया ना सफर हमने पैदल पूरा किया
ऐ ख़ुदा होता है जल्लाद की मानिंद मेरे हर रास्ते पर

ऐ ख़ुदा होता है जल्लाद की मानिंद मेरे हर रास्ते पर !


कोई खुशी ना कोई रंज मुस्तकिल होगा
हर ज़र्रे में तेरी मुनाज़ात होगी और उस मंज़र में मेरा दिल होगा !!

इस्तीफ़ादा – Exploitation
मानिंद – Resembling
मुस्तकिल – Permanent
मुनाज़ात – Prayer

कैसा है यह कल…

आज की ही सोच बस तू कल की ना फ़िक्र कर
जी भर के जी ले आज न जाने कैसा हो यह कल ।

तमन्ना ए – निशात में न आज तूँ यूं बरबाद कर कौन जाने क्या नया सा गुल खिला दे यह कल ।

भर सके तो भर ले पल तू ज़ामिन – ए – निशात से
कौन सा तूफ़ान – ए – आमद साथ लाये यह कल ।

है आज शहनशाह तू सल्तनत – ए – निशात चल
न जाने कोई जलजला फ़ना कर दे यह कल ।

रख सके तो ताअत – ओ – ज़ोहद तू, बचा के रख ले यह कल
फिर जी आराम से ना फ़िक्र कर कैसा है यह कल ।।

बदलना क्यों है ??

जिस राह पर तुम्हें कोई समझ ना सके
उस डगर पर आखिर चलना क्यों है ??
करो वही जिसमें तुम खुश हो
तुम्हें दूसरों के लिए बदलना क्यों है ??

लाखों आएं जाएंगे
सब अपनी-अपनी राय बताएंगे
कुछ समझाएँगे सच में ही
कुछ यूँ ही बस भरमाएंगे
खुद के दिल की आवाज को अनसुना कर
तुम्हें दूसरों को सुनना क्यों है ?
तुम करो वही जिसमें तुम खुश हो
तुम्हें दूसरों के लिए बदलना क्यों है ?

गर राहों में चलते-चलते
तुम थक कर कभी बैठ जाओगे
कोई दे दे ज़रा सहारा तुम्हें
सबसे ये आस लगाओगे
खुद की हिम्मत को छोड़कर
तुम्हें दूसरों के कदमों से चलना क्यों है ?
तुम करो वही जिसमें तुम खुश हो
तुम्हें दूसरों के लिए बदलना क्यों है ?

कहने को होंगे अपने
सब तुमको ठगते जाएंगे
भले खुद में हों लाखों कमियाँ
पर गलत तुम्हें ठहराएंगे
ऐसे झूठे प्यार के जाल में
आखिर तुम्हें उलझना क्यों है ?
तुम करो वही जिसमें तुम खुश हो
तुम्हें दूसरों के लिए बदलना क्यों है ?

जो छोटी-छोटी बातों का भी मुद्दा यूँ बनाएंगे
कोई एक सुनेगा ना तेरी
सब बेवजह चिल्लाएँगे
अपने सुकून को भूल कर
उस शोर को सुनना क्यों है ?
तुम करो वही जिसमें तुम खुश हो
तुम्हें दूसरों के लिए बदलना क्यों है ?

सब इतना तुम्हें सताएँगे 
कि तुम टूट कर बिखर जाओगे
गर आज जो खुद की नहीं सुनी
तो एक दिन पछताओगे
दूसरों की ज़िद के लिए
तुम्हें घुट-घुट कर यूँ मरना क्यों है ?
तुम करो वही जिसमें तुम खुश हो
तुम्हें दूसरों के लिए बदलना क्यों है..??

बेमतलब का मतलब

वो बेमतलब में इतने मतलबी हो गए कि हर बात में मतलब ढूंढने लगे
जो कभी बेमतलब ही बातों को भी यादें बना लेते थे वो आज बेमतलबी वादे करने लगे
जो मतलब ना मिला मुलाकातों में तो वो बेमतलब अजनबी हो गए
यूं तो हमारा मतलब भी बेमतलबी सा ही था
यूं , तो हमारा मतलब भी बेमतलबी सा ही था
पर ना जाने क्यों हम उनके नज़मिं से हो गए ।

वक्त ही तो है,बदल जाएगा

जो सब कुछ सही होता
तो मैं भी और कहीं होता
जो कमबख्त अक्स ना टूटा होता
तो वक्त यूं ना मुझसे रुठा होता।।

मंज़िल दूर हो जितनी
बस करीब सी लगती है 
नज़ाकत-ए-आफरीन से तो पुकारो
ये बेबस हसीन सी लगती है ।।

पर्यावरण बचाओ (एक नवजात की तरफ से)

मेरे भविष्य को मुझसे मत छीनो,
पेड़ों को काट काट कर ना गीनों,
ये मिट्टी मेरी भी विरासत है
क्यों इसे सम्हालने में तुम्हे इतनी आफत है,
नदियों को साफ ही रहने दो,
चिड़ियों को हर सुबह कुछ कहने दो,
तुम्हारा मन शायद भर गया,
पर ये खूबसूरती हमारे लिए भी रहने दो,

ये ईश्वर का दिया वरदान है मुझको
मेरे भविष्य को मुझसे मत छीनो ।।

ज़िन्दगी

बेबसी की तड़प में
मौत एक दवा सी है
तुम मुड़ के तो देखो जरा
ज़िंदगी बस हवा सी है ।।

तुम हर वक्त खुश रहो यह जरूरी नहीं है
हमेशा आगे बढ़ते रहो यही सही है
प्राण का परिंदा अचानक यूंही उड़ जाता है
तुम्हें भनक भी ना लगे यही ज़िंदगी है ।।

निराशा

उस काश की तलाश में
निराश हो गया था मैं
उस बेसबरी की बेफ़िक्री से
हताश हो गया था मैं
जो था मिला मुझे,
उस अब्र पे पड़ा था मैं
जो ना मिला मुझे,
तो सब्र से लड़ा था मैं !!

फिर उठा चला था मैं
जिस खाब पे रुका था मैं
पूरी बिसात से लगा था मैं
जो धूप में भी भीगा था मैं
बेबसी में भी टीका था मैं
यूं अंत में बिका था मैं
भटक रहा, अंटक रहा
हर डाल पर लटक रहा
जब निराश हो रुका था मैं
तेरे दर पे भी झुका था मैं !!

ख्वाहिश मेरी इतनी सी थी
मिल जाए वो जिसके काबिल था मैं
शुद्ध वही जो युद्ध सही
जिस युद्ध में गिरा था मैं
ज़ख्मी फिर खड़ा था मैं
दर्द में भी लड़ा था मैं
दर दर भी फिरा था मैं
दुश्मनों से जब घिरा था मैं
न डरा ना मैं, न हिला ना मैं
आखरी कतरे पर भी न डिगा था मैं !!

पर आस की तलाश में
निराश हो गया था मैं
मौत तब ना आयी थी
हताश हो के मरा था मैं !!

बिसात- capacity

उर्दू शायरी 3

अकीदों की गिरहें उलझी पड़ी हैं
ये अब मुझसे सुलझती क्यूं नहीं,
चारों अतराफ में आग जल रही है
मेरे हांथ की मशाल मुझसे बुझती क्यूं नहीं,

जो गर पता होता की ज़िंदगी में इतनी कुलफतें हैं,
तो कम्बख़त हम मौत का ही ख़ैर-मक्दम कर लेते ।

अकीदों -belief
गिरहें – knot
अतराफ – side
कुलफतें – sorrow
ख़ैर-मक्दम – welcome

उर्दू शायरी 2

एक तावील मुद्दत से मुस्कुराए नहीं तुम
क्या तक़सीर थी मेरी, की अरसे से लौट कर आए नहीं तुम

तुम्हारी ज़लालत को भी हुकूक समझा था हमने
क्यूं हमारी ख़ामोशी को समझ पाए नहीं तुम

लो तुम्हें आज फिर से बता दें
की बरहम तुम्हारे अफकार से निकाल पाए नहीं हम
जो तुम ना मुस्कुराए बरसों से
तो साथ हंसी की सुकूनत छोड़ आए कहीं हम

तावील – लंबे
तक़सीर – गलती
हुकूक – अधिकार
बरहम – क्रोधित
अफकार – खयाल
सुकूनत – महल

@_a_kaushik